✦ सपने का प्रतीक
पहाड़

पहाड़ का सपना देखने का मतलब — व्याख्या

पहाड़ का सपना देखने का क्या मतलब है — पहाड़ चढ़ना, दूर से उसे देखना, और अलग-अलग परंपराएं इस प्रतीक को कैसे समझती हैं।

Somnovis संपादकीय टीम

पहाड़ सपनों में शायद ही कभी सिर्फ एक भू-दृश्य होता है — यह लगभग हमेशा किसी बड़े लक्ष्य, कठिन परीक्षा या ज़िंदगी के किसी ऐसे चरण का प्रतीक बनता है जिसे पार करने में समय और मेहनत दोनों लगते हैं। पहाड़ का आकार और सपना देखने वाले की उससे दूरी दोनों ही मायने रखते हैं — सामने खड़ा विशाल पहाड़ जितना डरावना लग सकता है, दूर क्षितिज पर दिखता वही पहाड़ उतना ही शांत और प्रेरणादायक भी हो सकता है।

पहाड़ पर चढ़ना। धीरे-धीरे, मेहनत से पहाड़ चढ़ने का सपना आमतौर पर किसी असल लक्ष्य की ओर हो रही प्रगति को दर्शाता है — यह भरोसा कि रास्ता मुश्किल ज़रूर है, पर नामुमकिन नहीं। अगर चढ़ाई में सांस फूलती है या रास्ता बार-बार फिसलता है, तो यह उस मेहनत में लगने वाले असली दबाव को भी उतनी ही ईमानदारी से दिखाता है।

दूर से पहाड़ को देखना या उसके पास पहुंच न पाना। जब पहाड़ हमेशा दूर ही बना रहे, चाहे सपना देखने वाला कितना भी चले, तो यह किसी ऐसे लक्ष्य की ओर इशारा करता है जो अभी योजना के स्तर पर ही अटका हुआ है — सपना देखने वाला उसे साफ देख पा रहा है, लेकिन अभी उस तक पहुंचने का रास्ता तय नहीं कर पाया।

कौन-से विवरण अर्थ बदल देते हैं। चढ़ाई पूरी हुई या नहीं — और चोटी पर क्या मिला: कई पढ़तों में चोटी से दिखा दृश्य ही असली फल है, चढ़ाई नहीं। फिर पहाड़ की अपनी हरकत: अडिग खड़ा पहाड़, हिलता पहाड़, और ढहता पहाड़ तीन बिल्कुल अलग सपने हैं — पहला टेक है, आख़िरी टेक का गिर जाना। और स्थिति: पहाड़ सामने है (रास्ता रोकता), पीछे है (पीठ की ओट), या नीचे है (सब कुछ दिखता) — इन तीनों में सपना देखने वाले का पहाड़ से रिश्ता ही बदल जाता है।

यह सपना क्या नहीं कहता। पहाड़ का सपना किसी असल परियोजना के नतीजे की भविष्यवाणी नहीं है, न किसी नामज़द व्यक्ति की पहचान। सीढ़ियों वाले सपने से इसका फ़र्क़ याद रखने लायक़ है: सीढ़ी बनाई जाती है, पहाड़ मिलता है — एक इंसानी योजना की छवि है, दूसरा उस चीज़ की जो योजना से पहले से वहां खड़ी है।

विभिन्न परंपराओं की दृष्टि

शास्त्रीय इस्लामी स्वप्न-व्याख्या परंपरा पहाड़ को बड़े क़द के आदमी या बड़े वज़न के मामले के रूप में पढ़ती है — उस पर चढ़ना उस चीज़ के हासिल होने के रूप में जिसे वह दर्शाता है, चढ़ न पाना उसके आगे छोटा पड़ जाने के रूप में, और चोटी तक पहुंचना खुद उस चीज़ तक पहुंच जाने के रूप में। जो पहाड़ हिल जाए या ढह जाए, वह जिस किसी का प्रतीक है उसमें उथल-पुथल पढ़ी जाती है — और इस परंपरा में उसका मतलब कोई मनोदशा नहीं, कोई आदमी या संस्था है। पहाड़ की ओट लेना किसी ताक़त से मिली पनाह के रूप में पढ़ा जाता है।

सीढ़ियों से फ़र्क़ इस सामग्री में यह है कि पहाड़ «दिया हुआ» है — वह वहां है, कोई चढ़े या न चढ़े — जबकि सीढ़ी चढ़ने के लिए बनाई जाती है। परंपरा यह फ़र्क़ शब्दों में नहीं कहती, पर उसकी व्याख्याएं इसी के मुताबिक़ चलती हैं; इतना अवलोकन लेख अपनी ओर से कर सकता है — और यही वह रेखा है जो इन दो पन्नों को एक-दूसरे का दोहराव बनने से रोकती है।

युंगियन दृष्टिकोण में पहाड़ देखने की जगह है और वहां तक पहुंचने की मशक़्क़त: वह ऊंचाई जहां से वह दिखने लगता है जो बहुत पास होने की वजह से दिख नहीं रहा था। चोटी को आमतौर पर हासिल हुई महत्वाकांक्षा से ज़्यादा हासिल हुए परिप्रेक्ष्य का क्षण पढ़ा जाता है — और विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान की निगाह इस पर ख़ास रहती है कि चोटी के बाद क्या होता है: जो सपना देखने वाला उतर नहीं पाता, या जिसे ऊपर कुछ मिलता ही नहीं, उसे ऐसी ऊंचाई के पीछे भागा हुआ पढ़ा जाता है जो असल में किसी और चीज़ की जगह खड़ी थी।

यह छवि व्यक्तित्व-विकास की राह के बग़ल में चलती है, उसका पर्याय नहीं है — पहाड़ मंज़िल की छवि दे सकता है, पर रास्ते की रोज़ की मेहनत सीढ़ी जैसी छवियों में बंटती है। इसलिए यहां भी असली सवाल सपने का ब्योरा है: चढ़ाई चल रही है, रुकी है, या चोटी पर पहुंचकर पता चला है कि देखने लायक़ जो था, वह कहीं और था।

यहां भार उठाने वाला शब्द 靠山 (खाओ शान) है — शाब्दिक «टेक का पहाड़» — यानी सरपरस्त, पुश्त-पनाह: वह आदमी जिसकी हैसियत की छांव में आपकी हैसियत महफ़ूज़ रहती है। यह शब्द आज की ज़बान में पूरी तरह चालू है और लहजे में हल्का-सा तंज़ रखता है। पीठ पीछे खड़े पहाड़ का, या ढहते पहाड़ का सपना सीधे इसी के सामने पढ़ा जाता है — एक चीनी पाठक यह कड़ी बिना बताए जोड़ लेता है, और यही इस प्रविष्टि की सबसे काम की बात है: पहाड़ का गिरना यहां भू-दृश्य की घटना नहीं, सरपरस्ती का उठ जाना है।

लोक स्वप्न-पुस्तकों का रजिस्टर: उनकी व्याख्याएं इस आकार की हैं — पहाड़ देखना बड़े सौभाग्य का शकुन; पहाड़ चढ़ना जो चाहा गया उसके मिलने का; पहाड़ से उतरना संपत्ति खोने का; और ढहता पहाड़ बड़े दुर्भाग्य का। और उस बेचैन रूप के लिए, जिसमें सपना देखने वाला चढ़ता ही जाता है और हर बार एक और चोटी सामने पाता है, एक जुमला बना-बनाया है: 「这山望着那山高」 (चे शान वांग चे ना शान गाओ) — «इस पहाड़ से वह पहाड़ ऊंचा दिखता है» — जो कभी अपनी जगह से राज़ी न होने और हमेशा दूसरी जगह को बेहतर मानने के लिए कहा जाता है।

स्रोत

परंपरा वाले खंड इन कृतियों पर टिके हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर वाक्य उनसे उद्धरण है। इब्न सीरीन के नाम से प्रचलित ग्रंथ का लेखकत्व विवादित है। चीनी स्वप्न-ग्रंथ को केवल भावार्थ में दिया गया है, क्योंकि प्रतियों के शब्द अलग हैं, इसलिए संस्करण, अध्याय या वर्ष नहीं लिखा गया।

  • Artemidorus of Daldis, Oneirocritica (2nd century).
  • Muntakhab al-Kalām fī Tafsīr al-Aḥlām, the dream book attributed to Ibn Sirin.
  • Zhou Gong Jie Meng (周公解梦).
  • C. G. Jung, Man and His Symbols (1964), and the Collected Works.

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